ज़िंदगी के सफ़र में कई बार किसी अजनबी से मुलाक़ात होती है। उस मुलाक़ात के अंजाम से हम वाक़िफ़ नहीं होते। ये महज़ इत्तिफ़ाक़ होता है या क़िस्मत , किसी को नहीं पता। कभी वो मुलाक़ात सिर्फ़ कॉफ़ी डेट में तब्दील हो जाती है , और कभी इस उम्मीद में लोग बिछड़ते हैं कि शायद ज़िंदगी उन्हें दूसरा मौक़ा देगी, वो फिर मिलेंगे और तब उस रिश्ते का अंजाम कुछ और होगा । ये कविता “कॉफ़ी डेट” कुछ उस तरफ़ ही इशारा करती है ।

 

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