ज़िंदगी के रंग
बेरंग सी क्यूँ लगती है आज ज़िंदगी मुझे
सुकून ढूँढने चली हूँ ना जाने क्या वजह हैं
तनहाई का लेकर फ़ितूर आख़िर क्या होगा
ये जाना कि...
तेरी झाँझर
इस ख़ामोशी को तोड़ दो ना तुम
ज़रा अपनी झाँझर हलके से झनका दो
मदहोशी में डूब जाएँ फिर ये समा
ऐसे अपने नयनों से जाम छलका...
थोड़ा मैं संवार लूँ
पीछे छोड़ फ़िक्र जमाने की आज
ख़ुद को थोड़ा मैं संवार लूँ
आईने से वफ़ा की कोई उम्मीद नहीं
बस ख़ुद ही अपने को निहार लूँ
खोया हुआ वक़्त
ना जाने किसका मुझे इंतेज़ार है
और ज़िंदगी क्यूँ इस क़दर बेज़ार है
लौट कर आएगा खोया हुआ वक़्त है यक़ीं
फ़िज़ाओं में देखो छाया फिर खुमार...