इतरा रहा है ये मन मेरा करके सोलह सिंगार
माथे पे चमक रहा है मेरे कुमकुम सुर्ख़ लाल
आईने में दिखी हक़ीक़त और अब नहीं है कोई सवाल
पूरे हो चले हैं सारे जो भी थे अधूरे ख़्वाब

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